जब ते धोखो दे गए श्याम नाही खेली होरी (विरह रसिया) लिरिक्स - दामोदर शर्मा
Jab Te Dhokho De Gaye Shyam Nahi Kheli Hori Lyrics Lyrics
तर्ज (Tune): पारंपरिक विरह रसिया
जब ते धोखो दे गए श्याम, काहू के संग नाही खेली होरी। नाही खेली होरी, काहू के संग नाही खेली होरी। ऊधौ जी तुम जाओ मथुरा, ले पाती मोरी। यो कहियो समझाय, दरस बिन व्याकुल है गोरी। जब ते धोखो दे गए श्याम, काहू के संग नाही खेली होरी... परसों की कहि गए, मानि गई मैं इतनी भोरी। बीत गयी है बरसो, चुनर मेरी रही गयी कोरी। जब ते धोखो दे गए श्याम, काहू के संग नाही खेली होरी... या तन को मैं त्याग करुँगी, मतलब की होरी। जल्दी देउ मिलाय, उमरिया रही गयी है थोरी। जब ते धोखो दे गए श्याम, काहू के संग नाही खेली होरी... ब्रजवाला दधि चोर, प्रीत माने कुब्जा ते जोरी। कह रहे घासीराम, बनी रहे यह अविचल जोरी। जब ते धोखो दे गए श्याम, काहू के संग नाही खेली होरी...

अर्थ (Bhavarth)
FAQs
Q1: 'जब ते धोखो दे गए श्याम' रसिया के रचयिता और गायक कौन हैं?
A1: ब्रज के इस अत्यंत भावपूर्ण विरह रसिया को प्रसिद्ध भजन गायक दामोदर शर्मा और समूह ने गाया है। भजन की अंतिम पंक्तियों के अनुसार, इसके रचयिता घासीराम जी हैं।
Q2: गोपी उद्धव जी से मथुरा जाकर श्री कृष्ण को क्या संदेश देने को कह रही है?
A2: गोपी उद्धव जी से अपनी पाती (चिट्ठी) ले जाने को कह रही है और यह समझाने की विनती कर रही है कि उनके दर्शन के बिना वह व्याकुल है। उनकी उम्र अब बहुत कम बची है, इसलिए वे जल्दी आकर उनसे मिल लें।
Q3: गोपी ने होली क्यों नहीं खेली और उनकी श्री कृष्ण से क्या शिकायत है?
A3: श्री कृष्ण के मथुरा चले जाने के वियोग (विरह) में गोपी ने होली खेलना छोड़ दिया है। उनकी शिकायत है कि कन्हैया ने 'परसों' आने का वादा किया था, लेकिन अब बरसों बीत गए हैं और उनकी चुनरिया कोरी ही रह गई है।
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Categories: Braj Ras, Holi Rasiya
Deity: Shri Radha-Krishna
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Mohit Tarkar
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