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रंग डारो ना रसिया ओ साँवरे (होली भजन) लिरिक्स - धनवंतरी दास जी

Rang Daaro Na Rasiya O Sanware Lyrics - Dhanvantri Das Ji Lyrics

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रंग डारो ना रसिया ओ साँवरे (होली भजन) लिरिक्स - धनवंतरी दास जी

RANG DAARO NA RASIYA O SANWARE HOLI BHAJAN DHANVANTRI DAS

॥ दोहा ॥ फाल्गुन आयो ही सखी, मेरे मन में उठे तरंग। होरी खेलूँ श्याम सों, रहूँ श्याम के संग॥ रंगूँ श्याम के रंग, और रंग मोहे न भावे। चल सजनी नन्द गाँव, दरस मोहन के पावे॥ ॥ स्थायी ॥ रंग डारो ना रसिया ओ साँवरे, रंग डारो, न डारो, न डारो, रंग डारो। काहे रंग पिचकारी मारो, मेरी भीजे चुनरिया ओ साँवरे। रंग डारो ना रसिया ओ साँवरे... ऐसी अनीति न ठानो मोहन, छोडो मेरी डगरिया, ओ साँवरे। रंग डारो ना रसिया ओ साँवरे... जो कान्हा तुम होरी खेलो, आना मेरी नगरिया, ओ साँवरे। रंग डारो ना रसिया ओ साँवरे... राधा रमण तेरे चरणन में, लागी मेरी नजरिया, ओ साँवरे। रंग डारो ना रसिया ओ साँवरे...

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॥ दोहा ॥ फाल्गुन आयो ही सखी, मेरे मन में उठे तरंग। होरी खेलूँ श्याम सों, रहूँ श्याम के संग॥ रंगूँ श्याम के रंग, और रंग मोहे न भावे। चल सजनी नन्द गाँव, दरस मोहन के पावे॥

॥ स्थायी ॥ रंग डारो ना रसिया ओ साँवरे, रंग डारो, न डारो, न डारो, रंग डारो।

काहे रंग पिचकारी मारो, मेरी भीजे चुनरिया ओ साँवरे। रंग डारो ना रसिया ओ साँवरे...

ऐसी अनीति न ठानो मोहन, छोडो मेरी डगरिया, ओ साँवरे। रंग डारो ना रसिया ओ साँवरे...

जो कान्हा तुम होरी खेलो, आना मेरी नगरिया, ओ साँवरे। रंग डारो ना रसिया ओ साँवरे...

राधा रमण तेरे चरणन में, लागी मेरी नजरिया, ओ साँवरे। रंग डारो ना रसिया ओ साँवरे...

रंग डारो ना रसिया ओ साँवरे (होली भजन) लिरिक्स - धनवंतरी दास जी Video

अर्थ (Bhavarth)

यह फाल्गुन मास का एक अत्यंत मधुर और रसमय ब्रज लोकगीत (होली रसिया) है। भजन की शुरुआत में एक सखी अपनी सखी से कहती है कि फाल्गुन आते ही मेरे मन में उमंग उठने लगी है। मैं केवल श्याम के साथ होली खेलना चाहती हूँ और उसी के प्रेम रंग में रंगना चाहती हूँ, मुझे दुनिया का कोई और रंग नहीं भाता। भजन के मुख्य भाग में गोपी बीच रास्ते में कन्हैया द्वारा रंग डाले जाने पर नटखट शिकायत कर रही है। वह कहती है, "हे साँवरे रसिया! मुझ पर रंग मत डालो, तुम्हारी पिचकारी से मेरी चुनरी भीग रही है। बीच डगर (रास्ते) में मुझे रोककर ऐसी अनीति (अन्याय) मत करो। यदि तुम्हें सच में होली खेलनी है, तो ससम्मान मेरी नगरिया (गाँव/घर) आना।" अंत में गोपी अपना पूर्ण समर्पण दिखाते हुए कहती है कि हे राधा रमण! मेरी नज़र तो केवल आपके श्री चरणों में ही लगी हुई है।

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Frequently Asked Questions

'रंग डारो ना रसिया ओ साँवरे' होली भजन के गायक कौन हैं?

फाल्गुन की मस्ती और श्री राधा-रमण के प्रेम से भरे इस सुमधुर ब्रज रसिया को भजन गायक धनवंतरी दास जी (Dhanvantri Das Ji) ने गाया है।

गोपी कन्हैया से होली खेलने के लिए क्या शर्त रखती है?

गोपी कन्हैया से शिकायत करती है कि वह बीच रास्ते (डगरिया) में पिचकारी मारकर उसकी चुनरी न भिगोये। वह शर्त रखती है कि यदि कान्हा को होली खेलनी ही है, तो वे उसकी 'नगरिया' (उसके गाँव या घर) आएं।

दोहे "और रंग मोहे न भावे" का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है कि गोपी पूरी तरह से श्री कृष्ण की भक्ति और प्रेम में लीन हो चुकी है। वह कहती है कि वह केवल श्याम के रंग (प्रेम रंग) में ही रंगना चाहती है, अब उसे सांसारिक मोह-माया का कोई भी दूसरा रंग अच्छा नहीं लगता।

Categories: Holi Rasiya, Phalgun Bhajan, Radha Raman Bhajan, Braj Ras

Deity: Shri Radha-Krishna

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Mohit Tarkar
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मोहित तरकरMohit Tarkar

संस्थापक एवं मुख्य संपादक Founder & Chief Editor

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