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Shri HanumanFilmi Tarz Bhajan

हनुमत तुम मेरे लाओ संजीवनी (लक्ष्मण मूर्छा प्रसंग) भजन लिरिक्स

Hanumat Tum Mere Lao Sanjeevani Lyrics Lyrics

Singer:
Writer:
Contact: 8384844353
Location: Fateha, Farah (Mathura)

तर्ज (Tune): मैं तेरे इश्क़ में मर न जाऊं कहीं (Main tere ishq mein mar na jaaun kahin - Lata Mangeshkar)

HINDI BHAJAN
हनुमत तुम मेरे, लाओ संजीवनी,
कैसी विपदा पड़ी है, लखन के लिए।

मेरे रघुवर सुनो, मांग लो प्राण भी,
तो मैं हंसकर के दे दूं वचन के लिए।

राम ने यूं कहा हनुमान से,
तन अलग हो रहा हो जैसे जान से,
अंजनीसुत सुनो, मेरा संकट हरो,
रो रहा हूं मगर, तुम नहीं जानते,
है नहीं एक आंसू, नयन के लिए।

आप की हो कृपा, मेरे राम हे,
जग में ऐसा नहीं कोई काम रे,
रघुवर, मुझ पर, इतना एहसान है,
अभी जाता हूं मैं, आप को है नहीं,
फिर जरूरत किसी भी कथन के लिए।

अर्थ (Bhavarth)

विस्तृत भावार्थ एवं व्याख्या (Detailed Explanation) रामायण के सबसे भावुक और हृदयविदारक 'लक्ष्मण मूर्छा' प्रसंग पर आधारित इस अत्यंत मार्मिक भजन की रचना श्री मोहित तरकर जी ने की है। यह भजन केवल एक गीत नहीं, बल्कि भगवान श्री राम की मानवीय पीड़ा और भक्त शिरोमणि हनुमान जी के सर्वोच्च समर्पण (राम-हनुमान संवाद) का एक सजीव व भावपूर्ण चित्रण है। प्रसंग की शुरुआत (श्री राम की व्याकुलता): लंका के युद्ध के मैदान में जब वीर लक्ष्मण को मेघनाद की अमोघ शक्ति लगती है और वे मूर्छित होकर गिर पड़ते हैं, तब भगवान श्री राम एक साधारण मनुष्य की भांति विलाप करने लगते हैं। वे अपने परम भक्त और संकटमोचन हनुमान जी को पुकारते हुए कहते हैं कि "हे हनुमत! मेरे लखन पर कैसी घोर विपदा आ पड़ी है, अब तुम ही जाकर 'संजीवनी बूटी' लाओ और इसके प्राणों की रक्षा करो।" हनुमान जी का अगाध समर्पण: प्रभु की व्याकुलता देखकर महाबली हनुमान जी का हृदय द्रवित हो उठता है। वे हाथ जोड़कर अत्यंत भक्ति-भाव से कहते हैं, "हे मेरे रघुवर! आप संजीवनी की बात कर रहे हैं, यदि आप अपने वचन की खातिर मेरे प्राण भी मांग लें, तो मैं हँसते-हँसते अपने प्राणों की आहुति दे दूँगा।" यह पंक्तियाँ हनुमान जी की निस्वार्थ भक्ति और स्वामी-भक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण हैं। श्री राम की आंतरिक पीड़ा (तन से जान का अलग होना): भजन का यह भाग श्रोताओं की आँखों में आँसू ला देता है। श्री राम हनुमान जी (अंजनीसुत) से अपने हृदय का गहरा दर्द साझा करते हुए कहते हैं कि "लक्ष्मण के बिना मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे मेरे शरीर (तन) से मेरे प्राण (जान) अलग हो रहे हों।" राम जी कहते हैं कि वे भीतर ही भीतर इतना रो रहे हैं कि पीड़ा के कारण अब उनकी आँखों (नयन) में बहाने के लिए एक भी आँसू शेष नहीं बचा है। संकटमोचन का प्रस्थान और अटूट विश्वास: अपने आराध्य के मुख से ऐसे करुणा भरे शब्द सुनकर हनुमान जी तुरंत प्रभु को ढाँढस बंधाते हैं। वे कहते हैं, "हे राम जी! यदि आपकी कृपा हो, तो इस पूरे ब्रह्मांड में ऐसा कोई काम नहीं जो मैं न कर सकूँ। मुझे आपकी सेवा का यह अवसर मिला, यह मुझ पर आपका बहुत बड़ा एहसान है।" हनुमान जी प्रभु को आश्वस्त करते हैं कि "मैं इसी क्षण संजीवनी लाने के लिए प्रस्थान कर रहा हूँ, अब आपको चिंता करने या कुछ भी कहने (कथन) की तनिक भी आवश्यकता नहीं है।" आध्यात्मिक संदेश (Spiritual Significance): मोहित तरकर जी द्वारा रचित यह भावपूर्ण राम भजन हमें सिखाता है कि जब भक्त भगवान पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार रहता है, तो भगवान भी अपने भक्त के सामने अपना हृदय खोलकर रख देते हैं। यह 'संजीवनी प्रसंग' राम की भ्रातृ-प्रेम (भाईचारे) और हनुमान जी की अटूट सेवा का सबसे उत्तम उदाहरण है।

FAQs

Q1: 'हनुमत तुम मेरे लाओ संजीवनी' भजन किस पौराणिक प्रसंग पर आधारित है?

A1: यह हृदयस्पर्शी भजन रामायण के 'लक्ष्मण मूर्छा' प्रसंग पर आधारित है, जब मेघनाद की शक्ति लगने से लक्ष्मण जी मूर्छित हो जाते हैं और भगवान राम व्याकुल होकर हनुमान जी से संजीवनी बूटी लाने को कहते हैं।

Q2: इस भजन में श्री राम ने अपनी पीड़ा का वर्णन कैसे किया है?

A2: रचनाकार ने श्री राम की पीड़ा को बहुत ही मार्मिक शब्दों में पिरोया है। राम जी कहते हैं कि लक्ष्मण की इस दशा को देखकर उन्हें ऐसा लग रहा है जैसे उनके शरीर से उनके प्राण (जान) अलग हो रहे हों।

Q3: श्री राम की व्याकुलता देखकर हनुमान जी ने क्या उत्तर दिया?

A3: हनुमान जी ने अपनी सर्वोच्च भक्ति का परिचय देते हुए कहा कि "हे रघुवर! यदि आप वचन के लिए मेरे प्राण भी मांग लें, तो मैं हँसकर दे दूँगा। आपकी कृपा से मेरे लिए कोई भी कार्य असंभव नहीं है।"

Q4: इस करुणा से भरे 'राम-हनुमान संवाद' भजन के रचयिता कौन हैं?

A4: इस अत्यंत भावपूर्ण और सुंदर भजन की रचना युवा लेखक एवं रचनाकार श्री मोहित तरकर (Mohit Tarkar) जी द्वारा की गई है।

Categories: Filmi Tarz Bhajan

Deity: Shri Hanuman

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