"खेले मसाने में होरी दिगंबर..." काशी (वाराणसी) के घाटों से उठा यह गीत आज पूरे भारत में गूंज रहा है। सोशल मीडिया और इंटरनेट के इस युग में, इस भजन ने रातों-रात ऐसी लोकप्रियता हासिल की है कि अब यह हर होली के उत्सव, डीजे (DJ) पार्टी और यहाँ तक कि गृहस्थों के घरों में बजने लगा है। लेकिन क्या हम वास्तव में इस गीत का अर्थ समझते हैं? क्या मसान (श्मशान) की होली आम गृहस्थों के खेलने का विषय है?
आइए, आज हम इस अत्यंत गूढ़ भजन के शाब्दिक अर्थ, सदाशिव के 'अघोर' रूप के रहस्य और वर्तमान समय में गृहस्थों द्वारा की जा रही उस भयंकर भूल के बारे में विस्तार से जानेंगे, जिसके परिणाम पीढ़ियों तक भुगतने पड़ सकते हैं।
भजन के बोल और उनका शाब्दिक अर्थ
सबसे पहले इस भजन के मूल स्वरूप और इसके शब्दों में छिपे वैराग्य को समझते हैं:
भुत पिसाच बटोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी,
लखि सूंदर फागुनी छटा के, मन से रंग गुलाल हटा के,
चिता भसम की झोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी।
अर्थ: 'दिगंबर' अर्थात् जिनके वस्त्र ही दिशाएँ हैं (भगवान शिव), वे श्मशान (मसान) में भूत-पिशाचों की टोली को इकट्ठा करके होली खेल रहे हैं। फाल्गुन मास की सुंदर छटा को देखकर, उन्होंने लौकिक रंग और गुलाल को अपने मन से हटा दिया है और चिताओं की राख (भस्म) की झोली भरकर होली खेल रहे हैं।
नाचत गावत डमरू धारी, छोडत सर पे गरल पिचकारी,
बीते प्रेत थपोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी।
गोप न गोपी श्याम न राधा, ना कोई रोक न कोहनू वाधा,
न साजन न गोरी, दिगंबर खेले मसाने में होरी।
अर्थ: डमरूधारी शिव नाच रहे हैं, गा रहे हैं और उनके मस्तक से विष (गरल) की पिचकारी छूट रही है। यहाँ ब्रज की होली जैसा कुछ नहीं है। यहाँ न कोई गोप है, न गोपी, न श्याम हैं, न राधा। यहाँ सांसारिक प्रेम (साजन-गोरी) का कोई स्थान नहीं है। यहाँ सिर्फ और सिर्फ वैराग्य, मृत्यु का सत्य और अघोर शिव हैं।
सदाशिव का 'अघोर' मुख और तंत्र मार्ग का रहस्य
इस भजन में जिस शिव का वर्णन है, वह हमारे घर के मंदिरों में पूजे जाने वाले सौम्य आशुतोष नहीं हैं। शिव महापुराण के अनुसार, परब्रह्म सदाशिव के पाँच मुख हैं— सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष और ईशान।
इनमें से जो 'अघोर' मुख है, वह दक्षिण दिशा की ओर है। यह मुख विनाश, लय, प्रलय और घोर तंत्र साधनाओं का प्रतीक है। अघोर का अर्थ है—जहाँ कुछ भी 'घोर' या डरावना न लगे। जो पवित्र और अपवित्र के भेद से परे हो चुका है। श्मशान, जहाँ आम मनुष्य का जीवन समाप्त होता है, जहाँ से मृत्यु का भय उत्पन्न होता है, वहीं से अघोर साधना प्रारंभ होती है।
श्मशान की यह होली दरअसल अघोर तंत्र मार्ग के पथिकों (अघोरी साधुओं) का विषय है। उनके लिए 'चिता भस्म' इस बात का प्रतीक है कि यह पूरा संसार नश्वर है। मनुष्य का अहंकार, रूप, रंग, धन और संपदा—सब कुछ अंततः इसी राख में तब्दील होना है। शिव जब भस्म रमाते हैं, तो वह कामदेव (वासना) के जलने की राख होती है। यह अत्यंत उच्च कोटि के वैराग्य की अवस्था है।
गृहस्थ आश्रम और वर्तमान की भयंकर भूल (दिखावे की अंधी दौड़)
दुर्भाग्य से, पिछले कुछ वर्षों में 'मसान की होली' एक पर्यटन और मनोरंजन (Tourist Attraction) का विषय बन गई है। जो स्थान मृत्यु के चिंतन और परम वैराग्य का केंद्र था, वह आज दिखावे का अड्डा बन गया है।
आजकल हम देखते हैं कि गृहस्थ आश्रम के लोग, जो अपनी पत्नी, बच्चों और नौकरी-व्यापार से जुड़े हैं, वे डीजे (DJ), बैंड-बाजा और कैमरे लेकर श्मशान घाटों पर पहुँच रहे हैं। भस्म और राख उड़ाकर नाच-गाना हो रहा है, रील्स (Reels) बनाई जा रही हैं और इसे 'भक्ति' का नाम दिया जा रहा है। यह एक अत्यंत खतरनाक 'भेड़ चाल' है जिसने पूरी शहर की ऊर्जा को गंदा कर दिया है।
श्मशान गृहस्थों के लिए वर्जित क्यों है?
सनातन धर्म में गृहस्थों के लिए नियम बहुत स्पष्ट हैं। श्मशान को एक अपवित्र और भारी तामसिक ऊर्जा वाला स्थान माना जाता है। श्मशान से लौटने के बाद वस्त्र बाहर छोड़ने और तुरंत स्नान करने का कड़ा नियम क्यों बनाया गया था? इसके पीछे गहरे वैज्ञानिक और आध्यात्मिक कारण हैं:
- तामसिक ऊर्जा (Tamasic Energy): श्मशान में शोक, पीड़ा, अतृप्त इच्छाओं और मृत्यु के समय की घोर तामसिक ऊर्जा व्याप्त होती है।
- अतृप्त आत्माएं (Preta Yoni): जो आत्माएं अपने शरीर के छूटने के बाद मोह नहीं छोड़ पातीं, वे प्रेत योनि में वहीं भटकती रहती हैं।
- ऑरा (Aura) का दूषित होना: जब कोई आम गृहस्थ बिना किसी गुरु दीक्षा, बिना किसी रक्षा-कवच या बिना सिद्ध मंत्र के वहाँ जाकर नाच-गाना करता है, तो उसका आभामंडल (Aura) अत्यंत कमज़ोर हो जाता है।
चेतावनी: "सात पुश्तें मोक्ष मांगेंगी तो भी नहीं मिलेगा"
अघोरी और नागा साधुओं के पास अपने सिद्ध मंत्र, गुरु का संरक्षण और घोर तपस्या का बल होता है। वे उस तामसिक ऊर्जा को पचा सकते हैं। लेकिन एक आम मनुष्य, जो भौतिक सुखों में लिप्त है, वह इस ऊर्जा को नहीं झेल सकता।
तंत्र शास्त्र के जानकारों की एक बहुत ही स्पष्ट और खौफनाक चेतावनी है:
"नाच-गाने और बाजे के साथ जो गृहस्थ आज मसान में जा रहे हैं, यदि वहाँ की कोई नकारात्मक ऊर्जा (Negative Energy/Preta) उनके साथ चिपक गई, तो उनका पूरा कुल बर्बाद हो सकता है। यह कोई डराने वाली बात नहीं, बल्कि तंत्र का विज्ञान है। यदि ऐसी कोई शक्ति शरीर या घर में प्रवेश कर गई, तो सात पुश्तें अगर रो-रो कर मोक्ष मांगेंगी, तो भी मोक्ष नहीं मिलेगा।"
अज्ञानता में किया गया यह कृत्य आपके घर में कलह, अकारण रोग, वंश वृद्धि में रुकावट और भयंकर आर्थिक पतन का कारण बन सकता है। भगवान शिव श्मशान के अधिपति (भूतनाथ) हैं, वे तो विष भी पीकर नीलकंठ बन गए, लेकिन क्या हम एक बूँद विष भी पचा सकते हैं?
निष्कर्ष: हमारी भक्ति का स्वरूप कैसा होना चाहिए?
हमें यह समझना होगा कि सनातन धर्म में हर चीज़ का एक स्थान, एक समय और एक अधिकारी तय किया गया है।
ब्रज की होली गृहस्थों के लिए है। राधा-कृष्ण का प्रेम, फाल्गुन का उल्लास, अबीर, गुलाल और परिवार के साथ मिलकर खुशियां मनाना ही गृहस्थ जीवन का सौंदर्य है। वहीं, मसान की होली सन्यासियों, अघोरियों और विरक्तों के लिए है।
महादेव की भक्ति दिखावे की मोहताज नहीं है। यदि आप शिव से प्रेम करते हैं, तो उन्हें जल चढ़ाएं, उनके सौम्य रूप का ध्यान करें, और 'खेले मसाने में होरी दिगंबर' को एक सुंदर, दार्शनिक और वैराग्य-प्रधान भजन के रूप में सुनें। लेकिन इस वैराग्य की नकल करके श्मशान को पिकनिक स्पॉट बनाने की भूल कतई न करें। अपनी और अपने परिवार की रक्षा करें, और धर्म को उसके शुद्ध और शास्त्रों द्वारा निर्धारित रूप में ही स्वीकार करें।
हर हर महादेव!
